मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए पॉक्सो मामले में आरोपी बनाए गए पिता को उनकी 14 वर्षीय बेटी की कस्टडी वापस सौंपने का निर्देश दिया है। अदालत ने अपने फैसले में नाबालिग की स्पष्ट इच्छा, उसकी शिक्षा, भविष्य और सर्वोत्तम हित को सबसे अहम आधार माना। कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्ची की सुरक्षा और मानसिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए उसे ऐसे माहौल में रहने का अवसर मिलना चाहिए, जहां वह अपनी पढ़ाई और भविष्य पर पूरा ध्यान दे सके।
मामले की शुरुआत पति-पत्नी के बीच वर्ष 2020 से चल रहे पारिवारिक विवाद के बाद हुई थी। इसके बाद वर्ष 2021 में मां ने अपनी छोटी बेटी के कथित यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए पिता के खिलाफ पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया। शिकायत दर्ज होने के बाद पिता को 51 दिनों तक जेल में रहना पड़ा। बाद में मामले की सुनवाई के दौरान वर्ष 2025 में नाबालिग बेटी ने अदालत को लिखित रूप से बताया कि उसके पिता ने कभी उसके साथ कोई गलत व्यवहार नहीं किया। उसने यह भी कहा कि उसने पहले जो बयान दिए थे, वे मां के दबाव में दिए गए थे।
इसी बीच प्रशासनिक कार्रवाई के तहत बच्ची को पिता के पास से हटाकर शेल्टर होम भेज दिया गया था। इस निर्णय को चुनौती देते हुए पिता और उनकी बड़ी बेटी ने हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की। याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने सभी संबंधित पक्षों से अलग-अलग बंद कमरे में बातचीत की ताकि बच्ची की वास्तविक इच्छा और परिस्थितियों को समझा जा सके।
सुनवाई के दौरान 14 वर्षीय छात्रा ने अदालत को बताया कि उसके पिता हमेशा उसकी पढ़ाई, देखभाल और अन्य आवश्यकताओं का ध्यान रखते हैं। उसने स्पष्ट कहा कि वह अपने पिता के साथ पूरी तरह सुरक्षित महसूस करती है और आगे भी उन्हीं के साथ रहना चाहती है। उसने यह भी बताया कि उसका लक्ष्य उच्च शिक्षा प्राप्त करना है और वह भविष्य में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करना चाहती है।
बड़ी बहन, जो पेशे से इंजीनियर हैं, ने भी अदालत के सामने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि माता-पिता के वैवाहिक विवाद का असर छोटी बहन पर पड़ा और उसी दबाव में उससे पिता के खिलाफ बयान दिलवाए गए। उन्होंने कहा कि पिता ने हमेशा दोनों बेटियों की पढ़ाई, सुरक्षा और पालन-पोषण की जिम्मेदारी निभाई है तथा परिवार के प्रति अपना दायित्व पूरा किया है।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने माना कि दोनों बेटियां समझदार हैं और अपने भविष्य को लेकर स्पष्ट सोच रखती हैं। अदालत ने कहा कि नाबालिग की इच्छा और उसके सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसी आधार पर कोर्ट ने बच्ची को शेल्टर होम से निकालकर उसके पिता और बड़ी बहन की कस्टडी में सौंपने का आदेश दिया।
साथ ही अदालत ने बच्ची की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विशेष निर्देश भी जारी किए। कोर्ट ने कहा कि नाबालिग को एक मोबाइल फोन उपलब्ध कराया जाए, जिसमें संबंधित थाना प्रभारी का मोबाइल नंबर पहले से सेव हो, ताकि किसी भी आपात स्थिति या परेशानी में वह सीधे पुलिस से संपर्क कर सके।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि यह फैसला केवल बच्ची की कस्टडी और उसके रहने की व्यवस्था से संबंधित है। पॉक्सो मामले की मुख्य सुनवाई कर रही निचली अदालत इस आदेश में की गई टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना उपलब्ध साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर स्वतंत्र रूप से अपना निर्णय देगी। अदालत ने यह भी माना कि बच्ची की सुरक्षा, शिक्षा, मानसिक स्थिति और भविष्य को ध्यान में रखते हुए लिया गया यह निर्णय उसके सर्वोत्तम हित में है।

