लद्दाख के लिए सेना तैयार कर रही वैकल्पिक सप्लाई नेटवर्क: 298 किमी का नया मार्ग बनेगा अहम कड़ी, एक रास्ते पर निर्भरता होगी कम

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लद्दाख में चीन से लगी वास्तविक नियंत्रण रेखा के आसपास सेना की लॉजिस्टिक्स व्यवस्था को और मजबूत किया जा रहा है। इसका उद्देश्य ऐसा नेटवर्क तैयार करना है, जिससे किसी एक सड़क, पुल या प्रमुख सप्लाई रूट के बाधित होने की स्थिति में भी सैन्य ठिकानों तक जरूरी सामान की आपूर्ति जारी रखी जा सके।

इस योजना के तहत हथियार, गोला-बारूद, ईंधन, राशन और अन्य आवश्यक सामग्री पहुंचाने के लिए एक से ज्यादा वैकल्पिक रास्तों को विकसित किया जा रहा है। इससे किसी एक मार्ग पर निर्भरता कम होगी और मुश्किल परिस्थितियों में सेना की सप्लाई व्यवस्था ज्यादा मजबूत बनी रहेगी।

फिलहाल लद्दाख तक पहुंचने के लिए श्रीनगर-करगिल-लेह और मनाली-लेह प्रमुख मार्गों में शामिल हैं। अब करीब 298 किलोमीटर लंबा निमू-पदम-दरचा मार्ग भी महत्वपूर्ण कड़ी बनने जा रहा है। यह मार्ग हिमाचल की दिशा से जांस्कर होते हुए लद्दाख तक संपर्क उपलब्ध कराएगा।

इस नए मार्ग को हर मौसम में उपयोगी बनाने के लिए शिंकुन ला क्षेत्र में करीब 4.1 किलोमीटर लंबी सुरंग का निर्माण भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सुरंग तैयार होने के बाद सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण मार्ग बंद होने की समस्या को कम करने में मदद मिल सकती है।

दूसरी ओर, जोजिला सुरंग के जरिए श्रीनगर-करगिल-लेह मार्ग की सालभर कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने पर भी काम हो रहा है। इन परियोजनाओं का उद्देश्य केवल लद्दाख तक पहुंच आसान बनाना नहीं, बल्कि लंबे समय तक भरोसेमंद सैन्य और नागरिक संपर्क बनाए रखना है।

लद्दाख पहुंचने के बाद भी सेना के सामने एक बड़ी चुनौती अग्रिम इलाकों तक रसद पहुंचाने की होती है। इसी वजह से हनुथांग-तुरतुक, खाल्त्से-बटालिक और करगिल-दुमगिल जैसे अंदरूनी वैकल्पिक लिंक विकसित किए जा रहे हैं। इनके जरिए किसी एक सड़क या दर्रे के बाधित होने पर दूसरे मार्ग का इस्तेमाल किया जा सकेगा।

खारदुंग ला और बटालिक क्षेत्र में सुरंग परियोजनाओं पर भी काम आगे बढ़ रहा है। पहाड़ी इलाकों में मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों के कारण सड़क संपर्क प्रभावित होने की आशंका रहती है। ऐसे में कई रास्तों का नेटवर्क सेना की आवाजाही और सप्लाई दोनों के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।

करगिल-लेह-लद्दाख क्षेत्र में सड़क और सुरंग से जुड़ी कई परियोजनाओं पर करीब 18 हजार करोड़ रुपए के काम चलने की बात सामने आई है। बेहतर सड़क संपर्क से सर्दियों से पहले बड़े पैमाने पर जरूरी सामान जमा करने की जरूरत को धीरे-धीरे अधिक लचीला बनाया जा सकता है।

अब लॉजिस्टिक्स व्यवस्था में ड्रोन से होने वाले संभावित खतरे को भी ध्यान में रखा जा रहा है। इसके लिए काउंटर-ड्रोन सिस्टम, निगरानी व्यवस्था, सुरक्षित संचार और अग्रिम इलाकों में स्टोरेज सुविधाओं को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि सप्लाई नेटवर्क को आधुनिक सुरक्षा चुनौतियों से बचाया जा सके।

भारत-चीन सीमा पर लंबे समय से रणनीतिक और सैन्य तैयारियों को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है। पहले जहां अग्रिम चौकियों तक सड़क पहुंच बनाने पर प्रमुख ध्यान था, वहीं अब व्यवस्था को मल्टी-रूट नेटवर्क में बदलने की दिशा में काम हो रहा है। 298 किलोमीटर का नया मार्ग और लद्दाख के भीतर तैयार किए जा रहे वैकल्पिक संपर्क इसी रणनीति का हिस्सा हैं।