अशोकनगर में सामने आए इस सनसनीखेज हत्याकांड ने सभी को हैरान कर दिया। 35 वर्षीय सौरभ जैन कई महीनों तक अपने परिवार से संपर्क में नहीं रहे, लेकिन परिवार को यही विश्वास था कि वह अपनी पत्नी के साथ अलग रह रहे हैं। इसी कारण किसी को उनकी गुमशुदगी या किसी अनहोनी का संदेह नहीं हुआ। लगभग चार महीने तक सच्चाई परिवार से छिपी रही और किसी को इस बात का अंदाजा तक नहीं लगा कि उनके साथ क्या हो चुका है। मामला तब सामने आया जब एक अप्रत्याशित घटना ने पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया।
घटना का खुलासा उस समय हुआ जब सौरभ की पत्नी अपने बेटे का ट्रांसफर सर्टिफिकेट लेने स्कूल पहुंची। बातचीत के दौरान उसने स्कूल प्रबंधन को बताया कि उसके पति की मृत्यु हो चुकी है और इसी वजह से वह दूसरी जगह रहने जा रही है। यह बात वहां मौजूद एक शिक्षक ने भी सुनी। शिक्षक को यह जानकारी अजीब लगी क्योंकि सौरभ का परिवार उसी इलाके में रहता था और उन्हें इस तरह की किसी घटना की जानकारी नहीं थी। संदेह होने पर शिक्षक ने स्कूल के बाद सीधे परिवार से संपर्क किया और यही वह पल था, जब पूरे मामले का पर्दाफाश होना शुरू हुआ।
परिवार ने जब बहू से सौरभ की मौत के बारे में पूछा तो उसने बताया कि वह अपने एक परिचित के साथ जा रहे थे, तभी सड़क दुर्घटना में उनकी मौत हो गई और अंतिम संस्कार भी कर दिया गया। लेकिन जब उसी व्यक्ति से पूछताछ की गई, तो उसने बिल्कुल अलग कहानी सुनाई और दावा किया कि सौरभ की मौत हार्ट अटैक से हुई थी। एक ही घटना को लेकर दो अलग-अलग कारण सामने आने के बाद परिवार का शक गहरा गया और उन्हें लगा कि कहीं न कहीं कोई बड़ी सच्चाई छिपाई जा रही है।
संदेह दूर करने के लिए परिवार ने शहर के श्मशान घाटों में जाकर अंतिम संस्कार से जुड़े रिकॉर्ड खंगाले। काफी तलाश के बाद भी सौरभ के नाम से किसी भी प्रकार की एंट्री नहीं मिली। न किसी शव के दाह संस्कार का रिकॉर्ड मिला और न ही कोई ऐसा दस्तावेज जो पत्नी के दावे की पुष्टि करता हो। इसके बाद परिवार ने पुलिस से संपर्क किया और पूरे मामले की शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद जांच का दायरा तेजी से बढ़ा।
पुलिस जांच में सामने आया कि सौरभ और उनकी पत्नी की शादी वर्ष 2013 में हुई थी और दोनों का एक बेटा भी है। शुरुआती वर्षों तक सब कुछ सामान्य रहा, लेकिन समय के साथ पति-पत्नी के बीच विवाद बढ़ने लगे। कुछ समय अलग रहने के बाद दोनों ने फिर साथ रहने का फैसला किया, लेकिन संयुक्त परिवार से अलग रहने लगे। इसी दौरान सौरभ का अपने परिवार से संपर्क लगातार कम होता गया, जिससे कई महीनों तक किसी को उनके बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी।
पूछताछ के दौरान पुलिस ने पत्नी और उसके करीबी व्यक्ति से लगातार सवाल किए, लेकिन हर बार उनके बयान बदलते रहे। शुरुआत में उन्होंने हत्या की बात स्वीकार करते हुए दावा किया कि वारदात के बाद शव को एक मकान की छत पर जलाकर नष्ट कर दिया गया। पुलिस ने बताए गए स्थान की गहन जांच की, लेकिन वहां ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे इस कहानी की पुष्टि हो सके। इससे जांच और भी उलझ गई।
इसके बाद आरोपियों ने नया दावा किया कि शव के टुकड़े कर अलग-अलग हिस्सों को जलाया गया ताकि कोई सबूत न बचे। पुलिस ने इस दावे के आधार पर भी विस्तृत जांच की, लेकिन न तो कोई टिन की चादर मिली और न ही ऐसे निशान जो इस कहानी को सही साबित कर सकें। हालांकि जांच के दौरान पुलिस उस दुकान तक जरूर पहुंची, जहां से हत्या में इस्तेमाल किए जाने वाले धारदार हथियार की खरीदारी किए जाने की बात सामने आई। दुकानदार ने पूछताछ में संबंधित लोगों की पहचान भी की।
मामला यहीं नहीं रुका। पूछताछ आगे बढ़ी तो आरोपियों ने फिर बयान बदल दिया। कभी कहा गया कि शव की राख नदी में बहा दी गई, तो कभी दावा किया गया कि शव को तालाब में फेंका गया। बाद में एक और कहानी सामने आई कि शव को नदी में बहा दिया गया था। पुलिस ने हर दावे के आधार पर अलग-अलग स्थानों पर जांच और तलाश अभियान चलाया, लेकिन किसी भी जगह से ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला जिससे सौरभ के शव का पता लगाया जा सके। लगातार बदलते बयानों ने पूरे मामले को और अधिक रहस्यमय बना दिया।
जांच के दौरान पुलिस ने सौरभ के बेटे से भी बातचीत की। बच्चे ने बताया कि उसे एक अंतिम संस्कार में ले जाया गया था और उसे बताया गया था कि यह उसके पिता का अंतिम संस्कार है तथा उनकी मौत दुर्घटना में हुई है। हालांकि बच्चे को पूरी घटना की जानकारी नहीं थी, लेकिन उसके बयान से जांच को एक नई दिशा मिली। पुलिस ने इस जानकारी के आधार पर भी कई महत्वपूर्ण बिंदुओं की जांच शुरू की और पूरे घटनाक्रम को जोड़ने का प्रयास किया।
इस मामले ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए। यदि वास्तव में दुर्घटना हुई थी तो उसका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड क्यों नहीं मिला, परिवार को चार महीने तक सच्चाई से दूर क्यों रखा गया, और पूछताछ के दौरान लगातार अलग-अलग कहानियां क्यों सुनाई गईं। पुलिस ने सभी बयानों, परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जांच को आगे बढ़ाया। यह मामला इस बात का उदाहरण बन गया कि जब किसी अपराध को छिपाने की कोशिश की जाती है, तो बदलते बयान और विरोधाभासी दावे अंततः संदेह को और गहरा कर देते हैं तथा जांच एजेंसियों के लिए हर छोटे से छोटे तथ्य की पुष्टि करना बेहद जरूरी हो जाता है।

