ओडिशा के पुरी स्थित श्रीजगन्नाथ मंदिर की परंपराओं को लेकर एक बार फिर विवाद सामने आया है। पुरी के गजपति महाराज दिव्यसिंह देव ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा और स्नान यात्रा की प्राचीन धार्मिक परंपराओं की रक्षा करने की अपील की है। उनका कहना है कि इन आयोजनों की तिथियां शास्त्रों और सदियों पुरानी परंपराओं के अनुसार ही निर्धारित हैं, इसलिए इनमें किसी भी प्रकार का बदलाव उचित नहीं माना जाना चाहिए।
गजपति महाराज ने अपने पत्र में कहा कि ISKCON द्वारा विभिन्न देशों और कुछ राज्यों में अलग-अलग तिथियों पर रथयात्रा और स्नान यात्रा आयोजित की जा रही है। उनके अनुसार इससे श्रद्धालुओं के बीच भ्रम की स्थिति बन रही है और भगवान जगन्नाथ से जुड़ी मूल धार्मिक परंपराओं का पालन प्रभावित हो रहा है। उन्होंने केंद्र सरकार से इस विषय पर गंभीरता से विचार करने का आग्रह किया है।
गजपति महाराज ने स्पष्ट किया कि श्रीजगन्नाथ मंदिर की परंपरा केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उनका मानना है कि रथयात्रा का आयोजन निर्धारित पंचांग और शास्त्रीय विधानों के अनुरूप ही होना चाहिए। यदि अलग-अलग तिथियों पर आयोजन किए जाएंगे तो भविष्य में परंपराओं की एकरूपता बनाए रखना कठिन हो सकता है।
पत्र में यह भी उल्लेख किया गया कि धार्मिक ग्रंथों, विशेष रूप से स्कंद पुराण में भगवान जगन्नाथ की स्नान यात्रा और रथयात्रा की तिथियों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। गजपति महाराज का कहना है कि इन्हीं धार्मिक मानकों के आधार पर पुरी में हर वर्ष रथयात्रा का आयोजन किया जाता है और यही परंपरा विश्वभर में सम्मानित होनी चाहिए।
उन्होंने मध्य प्रदेश में प्रस्तावित कई रथयात्राओं पर भी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि यदि निर्धारित धार्मिक अवधि से बाहर रथयात्रा आयोजित की जाती है तो यह शास्त्रीय व्यवस्था के अनुरूप नहीं माना जा सकता। उन्होंने संबंधित संस्थाओं से परंपराओं का सम्मान करते हुए धार्मिक मर्यादाओं का पालन करने की अपील की।
गजपति महाराज वर्तमान में श्रीजगन्नाथ मंदिर प्रबंधन समिति के अध्यक्ष भी हैं और जगन्नाथ परंपरा में उन्हें भगवान जगन्नाथ का प्रमुख सेवक माना जाता है। रथयात्रा के दौरान ‘छेरा पहंरा’ की ऐतिहासिक और पवित्र सेवा भी उन्हीं के द्वारा संपन्न की जाती है। जगन्नाथ संस्कृति में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
दूसरी ओर ISKCON का कहना है कि भगवान जगन्नाथ किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं बल्कि पूरी दुनिया के श्रद्धालुओं के आराध्य हैं। संगठन के अनुसार विभिन्न देशों में स्थानीय मौसम, प्रशासनिक नियम, सार्वजनिक अवकाश और अन्य परिस्थितियों के कारण हर स्थान पर पुरी की तिथि के अनुसार आयोजन करना हमेशा संभव नहीं हो पाता। इसी कारण स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग तिथियों का चयन किया जाता है।
ISKCON का यह भी तर्क है कि इन आयोजनों का उद्देश्य भगवान जगन्नाथ की भक्ति और संस्कृति का वैश्विक स्तर पर प्रचार-प्रसार करना है। संस्था का कहना है कि यदि स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कार्यक्रम आयोजित किए जाएं तो अधिक संख्या में श्रद्धालु इसमें भाग ले सकते हैं और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का संदेश व्यापक स्तर तक पहुंचता है।
हालांकि पुरी मंदिर प्रशासन का मानना है कि वैश्विक प्रचार के साथ-साथ मूल धार्मिक परंपरा की एकरूपता बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। उनका कहना है कि यदि प्रत्येक संस्था अपनी सुविधा के अनुसार तिथियां निर्धारित करेगी तो भविष्य में धार्मिक परंपराओं को लेकर भ्रम और विवाद बढ़ सकते हैं।
रथयात्रा को लेकर यह मतभेद नया नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में भी इस मुद्दे पर पुरी मंदिर प्रशासन और ISKCON के बीच अलग-अलग तिथियों पर आयोजन को लेकर चर्चा होती रही है। इस बार राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र भेजे जाने के बाद यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। अब श्रद्धालुओं और धार्मिक संगठनों की नजर इस बात पर है कि परंपरा और वैश्विक आयोजन के बीच संतुलन बनाने के लिए आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।

