रेलवे कर्मचारी के दत्तक पुत्र होने की याचिका को हाई कोर्ट ने किया खारीज, रेलवे की अपील मंजूर

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 हाई कोर्ट ने दत्तक पुत्र होने के दावे से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए कहा है कि केवल पंजीकृत दत्तक पत्र (एडॉप्शन डीड) होने से गोद लेने की प्रक्रिया स्वतः सिद्ध नहीं हो जाती. यदि गोद लेने की वास्तविक प्रक्रिया और देना-लेना की रस्म साबित नहीं होती, तो दत्तक ग्रहण को वैध नहीं माना जा सकता.

न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीम साहू की एकलपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए उस निर्णय को निरस्त कर दिया, जिसमें एक व्यक्ति को रेलवे कर्मचारी का दत्तक पुत्र घोषित किया गया था। अदालत ने कहा कि वादी अपने दावे को कानून के अनुसार साबित करने में असफल रहा है।

जानें क्या है पूरा मामला?

मामले के अनुसार, कोरिया जिले के चिरमिरी निवासी लखी राम यादव ने दावा किया था कि वह दिवंगत रेलवे कर्मचारी पापा राव और उनकी पत्नी लक्ष्मीबाई के दत्तक पुत्र हैं. उन्होंने सिविल सूट दायर कर अदालत से खुद को दत्तक पुत्र घोषित करने की मांग की थी. वादी का कहना था कि पापा राव निःसंतान थे और उन्होंने लखी राम के जैविक पिता से अनुरोध कर उसे बचपन में गोद लिया था. उस समय उसकी उम्र करीब 5-6 वर्ष थी और समुदाय की परंपरा के अनुसार गोद लेने की रस्म पूरी की गई थी. बाद में 19 फरवरी 1998 को इस संबंध में एक पंजीकृत दत्तक पत्र भी तैयार किया गया. ट्रायल कोर्ट ने वादी के पक्ष में फैसला देते हुए उसे पापा राव का दत्तक पुत्र घोषित कर दिया था.

रेलवे प्रशासन ने फैसले को दी चुनौती

रेलवे प्रशासन और दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे बिलासपुर ने इस निर्णय के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की. उनका तर्क था कि दत्तक ग्रहण की प्रक्रिया प्रावधानों के अनुसार सिद्ध नहीं की गई है. रेलवे की ओर से कहा गया कि, दत्तक पत्र 1998 में पंजीकृत हुआ, जबकि कथित गोद लेने की घटना 1976 की बताई गई है. गोद लेने की वास्तविक रस्म (देना-लेना) के स्पष्ट और विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं किए गए. कोई स्वतंत्र समुदाय सदस्य गवाह के रूप में पेश नहीं किया गया. स्कूल या अन्य पुराने दस्तावेज भी पेश नहीं किए गए, जिनसे यह साबित हो कि वादी बचपन से ही दत्तक पुत्र के रूप में रह रहा था.